शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

तृप्ति

दुम हिलाती दो भूरी आँखों ने मेरा नाष्ता चुरा लिया,
आज पेट की भले ना पर ईमान की भूख ज़रूर मिटी है!  

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

रुकसाना बेगम

बेगम रुकसाना बीबी मैं मंसूर लालीवाला आपका इकलौता शौहर एक दरख्वास्त लिए आया हूँ,
कृपया अपनी एकाग्रता को इस दिशा एकत्र कीजियेगा।

उस जले टिंडे की भी क्या सुहावनी सी बात थी,
खाला की बनाई सिवइयों भी इसके आगे खाख थी,

जैसे मधुमास पर बिस्तर की दायीं ओर रखा हल्दी का दूध भी चाशनी सा मिष्ठी लगता है,
तुम्हारी सब्ज़ी में डाला कश्मीरी लाल मिर्च भी कुछ दालचीनी सा स्वादिष्ट लगता है।

भाप से भीगे फुलककों पर तुम्हारे स्पर्श का वह एहसास,
पापड की करारी ध्वनि पर तुम्हारी मंद मुस्कान का आभास,

मुझे याद है जब नन्ही फरीदा की खबर कैसे अचार के बहाने सुनाई थी तुमने,
मुझे याद है तिलगुड़ की इच्छा को कैसे मोतीचूर के बहाने तृप्त करवाई थी हमने।

आज आहार तो बस एक आखरी पूल है पुराने प्यार के टापू पोहोंचनेका ,
टिफ़िन की बातें तोह बस बहाना है तुम्हारे हालेदिल का स्वाद जाननेका।

काश वह नंगे लिपटे जिस्मों की रातें वहीँ थम जाती,
अधूरी रहगई सारी वह बातें लापता बन न बेहजाती।

भौतिक बुनियादों को पक्की करने में यूँ ज़िन्दगी न जुट जाती,
तेरे झुमके गिरवी रखवाने से पहले काश मेरी आँखें खुल जाती।

हाँ, आज भी पुराना प्यार ढूंढता, राह भटक जाता हूँ मैं,
भीनी आँखों की नमी झटकता हर शाम घर आता हूँ मैं।

विक्रेता

काले जूते, पीली कमीज, लाल टाई और ठंडा टिफिन,
जेंटलमेन बने बिक्री करवाने निकल पड़े विक्रेता बिपिन।

सुबह के नाश्ते में साहब की गाली,
दोपहर के भोजन की ग्राहक ने लगा डाली।
शाम की रिपोर्ट के साथ नौकरी जाने की धमकी,
सोचा घर जाकर रोउंगा पर वहां बीवी आ धमकी।

हर शाम बाद ज़हन बस एक ही सवाल अपने आप से दोहराता है,
की कंबखत यह रविवार सोमवार के छ: दिन बाद क्यों आता है?

दोसतों, शूरवीर तोह बस एक बार प्राणों की कुर्बानी कर शहीद कहलाता है,
पर विक्रेता टारगेट की पीड़ा को केरोसिन बना हर सपने को जला पल पल मरता है 

भाभीजी के लिए  किफायती डिटर्जेंट,
चुन्नू के लिए सतरंगी खिलोने,
साहब के लिए छुपे कैमरा वाला पेन,
कांता बाई के लिए नीला लेट्रिन का शैम्पू,

हाँ यही मेरा सत्य है।

काश वे कॉलेज के दिनों मैं हर शाम कबीर के दोहे ना दोहराता,
सॉक्रेटीस के सपनों को पीछे छोड़ मैं थोड़ा गणित पर भी ध्यान लगाता।

आज गंजे को कंगी, और कश्मीर में बर्फ तोह बेच सकता हूँ में,
पर क्या खुदके बीके सपनों को वक्त के दाम वापस खरीद सकता हूँ मैं?

सोमवार, 5 सितंबर 2016

कौन कहता है भगवान् सब देख रहा है...

नज़र लगने का मज़हर भी अपने आप में कुछ विपरीत होता है,
ये वह समय है जब पनौती नसीब से दो कदम आगे चलती है। 

जिससे मिलो कोई न कोई मनहूसियत का वाक्या सुनाता है,
जिसपे दिलो-जान छिड़कते हो वो भी उस समय जान खाता है। 

लोगों को तुम्हारी हरकतें आदतों सी लगने लगती है,
चमन पे खिली फूल पंखुड़ी, मुरझाई काली लगने लगती है।

फुक फुक के कदम रखने पर भी पैर फिसल जाता है,
फुक फुक के दुद्ध पीने पर भी छाछ जला जाता है। 

कब्ज़ की गोली लो तोह दस्त लग जाते हैं,
सर्दी के लक्षण में जान लेवा रोग नज़र आते हैं। 

सौ रुपये किलो सेब से सुलेमानी कीड़ा निकल आता है,
विवाह की बातों के बीच महबूबा का नाम निकल जाता है।

मंदिर में दान करने पर भी दुष्ट दानव चप्पल चुरा जाता है,
दादी के बनाये हलवे के निवालों से उन्ही का बाल निकल आता है।

बच्चों को घुमाने लेजाने से २ मिनट पहले ही दूर का फूफा टपक पड़ता है,
बेटी की फेरों से २ मिनट पहले ही ससुर मारुती ८०० की मांग करता है।

बिन बोले बातें समझने वाला एक ही रातमें अजनबी होजाता है,
अगवाह हवाई जहाज़ को बचाने में कोई मासूम जान गँवा बैठता है।

कुछ ऐसे ही फिसलती रेत सी ज़िन्दगी को मुट्ठी में बाँधने चले हैं हम,
कठपुतली होते हुए भी सारा का सारा खेल संभालने चले हैं हम।

ओ मानव इतना ग़ुरूर भी ना कर अपनी कामयाबी पर,
ओ मानव इतना ग़ुरूर भी ना कर अपनी कामयाबी पर,
क्योंकि शवों में जान फूंकने का काम अबभी प्रयोगशाला में नहीं हो पता है।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

अद्वैतवाद

ये घुसा में तेरे कान में,
अंदर ही अंदर,
विकराल काली सुरांग में,
मेरी खुराक है तुम्हारा कचरा, 
कहते हैं सब मुझे कनखजूरा। 
कभी नाले की आड़ में कभी कचरे के पहाड़ में,
मादा की खोज में घूमे हम भरे बगान में। 
मैं कनखजूरा हूँ।

मिटटी की खुशबू की आस में, मैंने पूरी गर्मी गुज़ारी है,
कूड़े के उस शाही महल में, हम जैसी और बोहोत बिमारी है।
मैं कनखजूरा हूँ।

एक रात में केले के पत्ते पर चढ़ा,
मधुमक्खी के छोटे छत्ते पर बढ़ा,

शहद की उस मीठी खुशबू से मैं ज़रा आकर्षित हो उठा,
कानों की उस दुनिया को छोड़ मैं मीठे मधु का आशिक हो उठा।

रहते वह ऐसे जैसे कोई संकलित परिवार हो,
उड़ते वह ऐसे जैसे खीर गंगा की शीतल धार हो। 

उनके छे पैर है और मेरे सौ,
मेरा दो काम है और उनके सौ। 

काश मेरे भी पंख होते,
काश मेरे भी डंख होते।
पुष्पों की उन महफिलों से मैं भी कभी अमृत चुराता,
मादा को रिझाने काश मैं भी कोई नाच नचाता।

अफ़सोस इस बात का नहीं की में रेंगता हूँ,
अफ़सोस इस बात का भी नहीं की लोगो के कान मैं फाड़ता हूँ,

बस काश ज़िन्दगी में मैं कभी जगह जगह उड़ पाता,
चढ़ने के अलावा काश में भी जगह जगह घूम पाता,

लेकिन आखिरकार में  कानखजुरा हूँ। 
में  कानखजुरा हूँ। 

शुक्रवार, 24 जून 2016

सागर नहीं, मुझे बूँद ही रहने दो...

खिलौना मेरे बचपन का, खोया कहके छुपाया था, 
मंजरे भैया से बचाने हाँ मैंने ठिकाने लगाया था। 

लाल लकीरें हर विषय में पाया था में रोया था,
लाल निशाँ मेरे गाल पे पाया था में रोया था। 
मुझे मारके रोये मैया, नजाने कैसे यह होजाता था?
दूसरी थप्पड़ के डर से यह सवाल वहीँ दब जाता था। 
कोई तोह मेरी बर्फी चुराता है,
कोई तोह मेरे पैसे उड़ाता है,
दादाजी के वहमों का मैं इकलौता साया था। 
घर ने एक भलीभांति चोर हाँ मुझमे ही पाया था  

गर्मी की छुट्टियां आई,
मेरे मोहल्ले में मिटटी आई,
मिटटी के उन टीलों में मैं मंदिर मस्जिद बनाता था,
धर्म ग्रन्थ के ऊपर जाकर बचपन मैं निभाता था।

खेल-कूद तो बाहाना था ग्लूकोस की बोतल चाटने का,
मोटा शरीर तोह बाहाना था मेरी दबी शक्तियां चुपानेका।
डाबर लाल के ज़माने में, मैं अखरोट दांत तोड़ लाता था,
बैंडऐड बिना के ज़माने में मैं घाव पे थूक लगता था। 
चाचा-मामा के घर जाकर मैं उन्हें घोडा बनाता था,
और उनकी दुखती कमर पर फिर में ही मलहम लगता था 

कमज़ोर नहीं कच्चा था में,
उस भोली माँ का छोटा बच्चा था में,
बचपन की इन बातों को मैं कब तक तुम्हे सुनाऊंगा,
वयस्क शरीर में छुपे बच्चे को कबतक बचा मैं पाउँगा।

लोग कहते हैं अब बड़े होजाने को, अपने पैर पे खड़े होजाने को,
ज़िम्मेदारी खुदकी खुद समझाने को, हँसना छोड़ दुखी होजाने को। 
कैसे मैं समझाऊं इन्हे की जवानी के चंगुल में मैं फंस जाऊँगा,
कैसे मैं समझाऊं इन्हे की बिना बचपन के कहीं मैं मरजाऊँगा। 

बुधवार, 1 जून 2016

व्यवसाय

टुटा जूता, फटा थैला, 
इकत्तीस तारिक को मेरा पतलून है मैला। 

घर में मैँ और दरवाज़े पे ताला, 
उधार के चक्कर में निकला मेरा दिवाला।

द्वार पर हर दस्तक लगती है षडियंत्र का खेल मुझे,  
अपना घर ही अब लगता है लेनदारों की जेल मुझे। 

खाने को सिर्फ गाली और जीने को सिर्फ तिनके का सहारा है। 
इस फटेहाल जुआरी को पहली तारीख का वेतन ही गुज़ारा है। 

इस बार के संबलन से वादा है मैं कुछ  बचाऊंगा,
पिछली बार की बचत से माँ को चिमटा दिलाऊंगा। 

इन सपनो को एक दिन मैं ज़रूर पूरा करके दिखाऊंगा,
और यही जूठे वादे करके मैं फिर पैसा जुए पे उड़ाऊंगा।  

लगता है इस बार की बाज़ी तोह मेरी ही है, सोचता हूँ बोली लगालुं थोड़ी ज़्यादा।
ज़र, ज़मीन और जोरू तोह खो ही दी है, इसबार खून बेचकर कमाऊंगा प्यादा।

जुआरी तोह तुम भी हो जो हर घडी एक नया दाव, एक नया पैंतरा खेलते हो,
जुआरी तोह तुम भी हो जो अपनों से ज़्यादा अपने सपनो के बारे में सोचते हो।